नारद द्वारा चिट्ठा हटाने का निर्णय एकदम सही है
जैसा कि सभी साथी जानते हैं कि हाल ही में अशिष्ट भाषा के प्रयोग के कारण एक चिट्ठा नारद से हटा दिए गया, इस न्यायोचित कार्यवाही पर कुछ ब्लॉगर नियोजित तरीके से हो हल्ला मचा रहे हैं। मेरी कोशिश रहती है कि व्यर्थ के विवादों में पड़कर समय नष्ट करने की बजाय रचनात्मक कार्य करूं लेकिन चूंकि गिनती के कुछ ब्लॉगों द्वारा जानबूझकर इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है जैसे कि यह कोई अनुचित कार्यवाही हो तो हम सबका कर्तव्य बनता है कि इस मसले पर नारद के सही फैसले के प्रति समर्थन व्यक्त करें।
नारद समिति द्वारा लिया गया यह फैसला एकदम सही और पूर्णतया निष्पक्ष है। इस तरह के चिट्ठे चिट्ठाजगत के भाईचारे को बिगाड़कर रस लेते हैं। मैं नारद सलाहकार समिति की इस निर्णय के लिए प्रशंसा करता हूँ तथा अपना धन्यवाद व्यक्त करता हूँ। मेरा नारद सलाहकार समिति से अनुरोध है कि आगे से सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले चिट्ठे चाहे वे किसी धर्म के खिलाफ लिखते हों, नारद पर पंजीकरण ही न किया जाए।
इस तरह के चिट्ठों के आने से पहले चिट्ठाजगत का माहौल हमेशा सौहार्दपूर्ण था, कोई छिटपुट बहस होती भी थी तो उसमें संयमित तरीके से बात होती थी और मनमुटाव तो होता ही न था। जब से ये चिट्ठे आए हैं इन्होंने हर तरफ अराजकता फैला दी है। जब से ये महान धर्मनिरेपेक्ष आत्माएं आई हैं सबको पकड़-पकड़कर सांप्रदायिक सिद्ध करने में जुटी हैं। ये लोग यह सोचते हैं कि वे बहुत ही महान लेखक और विचारक हैं, दुनिया में बस अकेले उनको ही अक्ल है बाकी सब तो बेअक्ल हैं; भाषा की, साहित्य की और ब्लॉगिंग की बस उनको ही समझ है और उनको छोड़कर सब संघी हैं, हिन्दूवादी हैं, कट्टरवादी हैं, एकमात्र धर्मनिरपेक्ष वही हैं, अल्पसंख्यकों के मसीहा वही हैं। इनकी सोच अमेरिका की तरह ही तानाशाही है कि "जो हमारे साथ नहीं है वो हमारा दुश्मन है"। इसी तर्ज पर इनका सोचना है कि जो इनसे सहमत है वो ठीक बाकी सब गलत हैं।
कुछ चिट्ठाकार सांप्रदायिक और व्यक्तिगत विद्वेष फैलाने वाला लेखन क्यों कर रहे हैं?
इस प्रकार के चिट्ठाकारों के बारे में ईस्वामी ने ट्रॉल्लिंग - हिन्दी चिट्ठाकारी में नया शिगूफा नामक लेख लिखा था जो कि इनकी मानसिकता को सपष्ट करता है। इस तरह के चिट्ठाकारों को ट्रॉल्स की श्रेणी में रखा जा सकता है। ईस्वामी का यह लेख एक मस्ट रीड है, समय की कसौटी पर यह लेख खुद को सही साबित कर रहा है।
इस लेख के कुछ अंश देखिए:
‘ट्रॉल्ल‘ इन्टरनेट पर उस व्यक्ति को कहा जाता है जो जानबूझ कर संवेदनशील मुद्दों पर आपत्तीजनक, अपमानजनक और भडकाऊ बातें लिखता है. कई बार तो कानूनी कार्यवाही की नौबत आ जाती है. (कृपया दी हुई विकी कडी पढें!)
ट्राल्स के बारे में ये जानीमानी बात है की इनके पास खाली समय की कोई कमी नहीं होती, विघ्नसंतोष में सुख पाने की मनोवृत्ती होती है, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की कमी होती है और अपने निजी जीवन में कोई सम्मानजनक स्थान नही होता.
इसका उद्देश्य कुछ भी हो सकता है - वैमनस्य फ़ैलाना, लोगों का समय नष्ट करना, उन्हें खिन्न करना. अरुचिपूर्ण, अनुपयोगी और अनुत्पादक लेखन! एक शब्द में ’टेस्ट-लैस’!
कुछ लोगों को अच्छा लिखना तो आता नहीं अतः घटिया, विवादास्पद लिखकर सनसनी फैलाकर प्रसिद्ध होना चाहते हैं। जिसे अच्छा लिखना आता है वो खुद ब खुद उभरकर आ जाता है। फुरसतिया जी, समीरलाल जी, सुनील जी और रविरतलामी जी आदि इसके उदाहरण हैं। जो अच्छे लेखक हैं उन्हें प्रसिद्धि के लिए हथकंडों की जरुरत नहीं होती। और तो और अच्छा लिखने वाले को रिकॉग्नाइज होने के लिए ज्यादा वक्त भी नहीं चाहिए होता। समीर जी ने अपनी चिट्ठाकारी के आरंभ में ही ख्याति अर्जित करनी शुरु कर दी थी, हाल ही में आए ज्ञानदत्त जी और काकेश जी जैसे लोग भी इस बात को साबित कर रहे हैं।
इस तरह के चिट्ठाकार फूहड़ और विवादास्पद लेखन द्वारा सबका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। जैसा कि इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा:
कुछ लोग ब्लोगिन्ग के जरिये वही राजनीति करने की कोशिश भी कर रहे हैं जो हिंदी साहित्य में पिछले सौ साल से होती आ रही है और जिसके जरिये कुछ लोग एक-दो किताबें लिख कर स्वनामधन्य आलोचक हो गए तो कुछ गाली-गलौच लिख कर और यौन कुंठाओं को अभिव्यक्ति देकर महान क्रांतिकारी कवि-कथाकार.
ये चिट्ठाकार मीडिया से जुड़े हैं अतः वही फार्मूले यहाँ भी आजमा रहे हैं। वहाँ पर इनको लेखन की पूरी आजादी होती नहीं अतः यहाँ जी भरकर अपनी घटिया शैली में लिख रहे हैं।
इन चिट्ठाकारों के इस प्रकार के लेखन का एक अन्य उद्देश्य है - अपनी विचारधारा का प्रचार।
इन चिट्ठाकारों में से बहुसंख्यक वामपंथी/माओवादी/नक्सली विचारधारा के हैं। अब वामपंथ तक तो सही है लेकिन नक्सली आदि खतरनाक विचारधारा का ये लोग खुलेआम समर्थन करते हैं। अब सभ्य तरीके से अपनी विचारधारा के बारे में लिखने की बजाय ये इसके लिए हिंसक किस्म के लेखन का सहारा ले रहे हैं। जो इनसे सहमत होता है ठीक वरना उसके खिलाफ ये मोर्चा खोल देते हैं। इनका ये व्यवहार सामान्य नहीं है वरन ये एक प्लान्ड तरीके से काम कर रहे हैं। इनको मालूम है कि वर्तमान में ब्लॉगिंग नैट पर सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम है, इसलिए इसमें घुस आए। साथ ही इन्हें मालूम था कि इंग्लिश ब्लॉगजगत में इस तरह के लेखन पर इनको अटेंशन मिलने से रहा, अतः हिन्दी को इसके लिए पकड़ा। हिन्दी में लेखन का इनका उद्देश्य यही है न कि हिन्दी के प्रति किसी तरह का प्रेम। दूसरे शब्दों में कहें तो ये हिडन एजेंडे पर काम कर रहे हैं।
क्या नारद को किसी चिट्ठाकार का पंजीकरण रद्द करने का हक है
इस तरह के चिट्ठों के बारे में हिन्दिनी पर अपने लेख में ईस्वामी कहते हैं:
ट्रॉल्स का हश्र तय है. जैसे सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिये उछल-कूद या तोड-फ़ोड करता बदतमीज़ बच्चा चांटा खाने से लेकर कमरे के बाहर कर दिये जाने तक किसी भी किस्म की सज़ा पाता है वैसे ही ऐतिहासिक रूप से ट्रॉल्स को डिसकशन फ़ोरम्स या ईमेल ग्रुप्स पर से लानत-मलामत कर के बैन किया जाता रहा है. जो बगिया लगाना जानते हैं उन्हें खरपतवार से निपटना आता है. मॉडरेटर्स की नियमावली पूर्व-निर्धारित होती है और समूह के भले के लिये अनुशासन की कार्यवाही करना पडती है.
चेताने पर ट्रॉल्स अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं और समूह की नींव रखने वालों को फ़ासीवाद, तानाशाही, तालिबानियत की तोहमतें लगाते हैं. घडियालीआंसू और बकवाद शुरु करते हैं अत: कई बार उन्हें बैन करने की कार्यवाही एक झटके में की जाती है - बिना किसी पूर्व सूचना के- जनता इतनी त्रस्त हो चुकती है राहत की सांस लेती है - “गुड रिड्डेंस”! शहीदी सुख लेने का कोई मौका नहीं मिलता. कई बार तो ट्रॉल्स के घर,दफ़्तर आदी के पते से से आने वाले किसी नई सदस्यता के निवेदन तक को खारिज कर दिया जाता है.
अब इस प्रकार के एक चिट्ठे पर कार्यवाही की गई है तो ये लोग होहल्ला मचा रहे हैं। प्रश्न उठता है कि क्या नारद अथवा किसी अन्य ब्लॉग एग्रीगेटर को इन्हें अलग करने का हक है।
आज अधिकतर चिट्ठाकार नारद के इस कदम से सहमत हैं। केवल कुछ एक लोग ही किंचित कारणों से इनका समर्थन कर रहे हैं जिनमें या तो इनकी जैसी ही विचारधारा के साथी हैं या फिर कुछ लोग केवल दोस्ती निभाने के लिए इनका साथ दे रहे हैं तीसरे प्रकार के लोग वो हैं जो किसी भी प्रकार के प्रतिबंध के विरोधी हैं। इन तीसरे प्रकार के लोगों के लिए ही निम्न बातें रखने जा रहा हूँ।
जितना हक किसी को अपना चिट्ठा बनाने का और उस पर मनमर्जी की बात लिखने का है उतना ही हक किसी ब्लॉग एग्रीगेटर को किसी चिट्ठे को हटाने का है। ब्लॉग एग्रीगेटर की मर्जी कि वो किसे एग्रीगेट करे और किसे नहीं, इसमें फैसला देने वाले और कौन खामखां। यदि नियमों का उल्लंघन करने पर किसी को हटाया जाता है तो इसमें विरोध कैसा। नारद पर रजिस्टर होते वक्त चिट्ठाकार से कुछ नियमों पर सहमति प्राप्त की जाती है। नारद के रजिस्ट्रेशन के पेज पर नियम नंबर ४ और ५ पढ़िए।
4. अपने विचारों को संयत भाषा में प्रकट करें, किसी भी प्रकार की अभद्र और अश्लील भाषा के प्रयोग से बचें।
5. किसी साथी चिट्ठाकार से आपके चिट्ठे पर आपत्तिजनक भाषा एवं विषय के बारे में शिकायत मिलने और नारद द्वारा जाँच किए जाने के उपरान्त, उस ब्लॉग का पंजीकरण रद्द करने की कार्रवाई की जा सकती है।
नियमावली में सपष्ट लिखा है कि शिकायत मिलने पर पंजीकरण रद्द करने की कार्यवाही की जा सकती है। यदि कोई चिट्ठाकार इन नियमों से सहमत नहीं है तो फिर रजिस्ट्रेशन के लिए अप्लाई क्यों किया?? किसी को जबरदस्ती पकड़कर तो लाया नहीं गया फिर अगर नियम स्वीकार नहीं थे तो पंजीकरण के लिए आवेदन क्यों किया गया।
जो लोग नारद में हमारी आस्था को नहीं समझते उन्हें सलाह दी जाती है कि अक्षरग्राम की आर्काइव्स और पुराने चिट्ठाकारों के ब्लॉगों पर शुरुआती दिनों की पोस्टें पढ़ें। कुछ लोगों के लिए नारद बस एक अदद मशीनी एग्रीगेटर है, जिस दिन इन्हें कहीं और से अधिक हिट मिलने लगें ये वहाँ दौड़ जाएंगे। नारद एक दिन में नहीं बना, इसको बनाने और खड़ा करने के लिए कई लोगों ने अपनी रातें काली की हैं, अपना अमूल्य समय दिया है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग समझते हैं कि बस एक एग्रीगेटर खड़ा किया और हो गया। नारद को सुचारू रुप से चलाने के लिए एक पूरी तकनीकी टीम रात-दिन सक्रिय रहती है। अब अगर नारद का संचालक मंडल इसके लिए कोई नियमावली बनाता है तो फिर कुछ लोगों को क्यों तकलीफ है।
यह ठीक है कि एक ब्लॉग एग्रीगेटर ब्लॉग्स की फीड को एग्रीगेट करता है लेकिन उसे अपने नियम तय करने का हक है। उदाहरण के लिए नारद पर केवल देवनागरी लिपि वाले ब्लॉगों को स्थान दिया जाता है, अब यदि कोई रोमन में लिखे और शामिल न किए जाने पर शोर मचाए तो यह उसकी मूर्खता ही है। ब्लॉग एग्रीगेटर की भूमिका के बारे में ईस्वामी अपने उपरोक्त लेख में कहते हैं:
एग्रीगेटर का काम होता है पाठकों को सूचित करना की किसी ने अपनी स्वयं की वेबसाईट पर कुछ लिखा है. क्या लिखा है वो लिखने वाला जाने और क्या प्रतिक्रिया करनी है वो प्रतिक्रिया करने वाला जाने! एग्रीगेटर्स समभाव की भावना से चलते हैं, वे चिट्ठाकारों के विवेक पर विश्वास करने की अवधारणा के हिमायती होते हैं. उनके आत्मानुशासन, संवेदनशीलता और सहनशीलता पर निर्भर होते हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बडे पैरोकार होते हैं. वे सैद्धांतिक रूप से माडरेशन के हिमायती नहीं लेकिन कोई भी एग्रीगेटर स्वछंदता की धमाचौकड़ी और अतिक्रमण के अतिरेक का महीन फ़र्क करने के लिये स्वतंत्र होता है.
अब नियमानुसार कार्यवाही की गई है तो ये लोग हायतौबा मचा रहे हैं। इस व्यवहार की पहले से आशंका थी, ईस्वामी अपने उपरोक्त लेख में लिखते हैं:
चेताने पर ट्रॉल्स अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं और समूह की नींव रखने वालों को फ़ासीवाद, तानाशाही, तालिबानियत की तोहमतें लगाते हैं. घडियालीआंसू और बकवाद शुरु करते हैं अत: कई बार उन्हें बैन करने की कार्यवाही एक झटके में की जाती है - बिना किसी पूर्व सूचना के- जनता इतनी त्रस्त हो चुकती है राहत की सांस लेती है - “गुड रिड्डेंस”! शहीदी सुख लेने का कोई मौका नहीं मिलता. कई बार तो ट्रॉल्स के घर,दफ़्तर आदी के पते से से आने वाले किसी नई सदस्यता के निवेदन तक को खारिज कर दिया जाता है.
ये बातें पूर्णतया सच साबित होती दिख रही हैं। अब इन लोगों ने सम्मनीय़ सदस्यों अनूप जी, जीतू जी आदि हेतु अभद्र शब्दों का प्रयोग शुरु कर दिया है। जितना सम्मानित साथी इनसे इज्जत से बात करते हैं उतना ही ये उनका और अपमान करने लगते हैं।
जो लोग किसी ब्लॉग को नारद से हटाए जाने के पक्ष में नहीं उनसे मेरा प्रश्न है कि नारद के बारे में ही ऐसी बहस क्यों की जा रही है। इंटरनैट पर हर साइट, हर सेवा पर जाकर देखिए। सबके अपने अपने नियम और शर्ते हैं जिनका पालन न करने पर वे सदस्यों का पंजीकरण रद्द करने तथा निष्काषन जैसी कार्यवाही की जाती है और तो और ब्लॉगर में भी किसी ब्लॉग को Flag करने की व्यवस्था होती है और पर्याप्त शिकायत मिलने पर ब्लॉगर किसी ब्लॉग को सूची से हटा सकता है। यहाँ तक कि दुनिया के सबसे बड़े ज्ञानकोष जिसे कि कोई भी संपादित कर सकता है और जो सबके लिए खुला है, उस पर भी गलत कार्य करने वालों (वेंडेलिस्म) के खिलाफ कार्यवाही की जाती है।
कुछ लोगों की आदत है कि जब भी इस तरह की कोई बात चले उसे बैन और सैंसरशिप का नाम देने लगेंगे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा उठा लेंगे।
पहली बात उपरोक्त ब्लॉग को बंद नहीं किया गया है और न किया जा सकता है। ब्लॉगर और वर्डप्रैस.कॉम आदि ब्लॉगिंग सेवाएं ही किसी ब्लॉग को बंद कर सकती हैं कोई और नहीं। ब्लॉग बंद नहीं हुआ है लिखने वाले को जो लिखना है लिखता रहे। जिनको पढ़ना है वे ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकते हैं या फीड सबस्क्राइब कर सकते हैं। फिर इतने महान लेखक को नारद जैसे माध्यम की जरुरत क्या है? इसकी जरुरत तो हम जैसे सामान्य ब्लॉगरों को है। नारद सलाहकार समिति किसी भी ब्लॉग को न बंद कर सकती है न कर सकेगी, हाँ चूंकि नारद एक पवित्र भावना से काम कर रहा है तो उसे हक है कि वह कुत्सित इरादे वाले ब्लॉगों को स्थान न दे।
माना आपने अपने गांव/शहर में रचनात्मक उद्देश्य से एक मंच, एक समूह बनाया है अब कोई उसमें आकर अराजकता पैदा करे तो आप उसे हटाएंगे न या कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रकता के नाम पर उसे झेलते रहेंगे। नैट पर सैकड़ों फोरम और ग्रुप हैं सब में अनुशासन हेतु नियम होते हैं इस तरह के नियम न हों तो वो एक दिन न चल पाएं। कुछ साथियों का नैट का अनुभव सीमित है इस तरह की 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की बात करते हैं।
प्रतिबंध के संबंध में एक टिप्पणीकर्ता ने नारद उवाच पर कहा:
पश्चिमी देशों में सब कुछ खुला है लेकिन वहाँ भी टीवी के लिए एक वाटरशेड टाइम निश्चित है(आमतौर पर रात के नौ बजे), उसके बाद ही एफ़-वर्ड या सी-वर्ड का प्रयोग बर्दाश्त किया जाएगा. 'निग्गर' शब्द के प्रयोग पर अभी पिछले हफ़्ते बिग ब्रदर हाउस से एक मोहतरमा को बाहर फेंका गया. अमरीका में तो किसी अश्वेत को निग्गर संबोधित कर आप आराम से अपने लिए जेल जाने का इंतज़ाम कर सकते हैं. पश्चिमी देशों में भी फ़िल्मों को सर्टिफ़िकेट देने की व्यवस्था है. न सिर्फ़ व्यवस्था है, बल्कि उसे कड़ाई से लागू भी किया जाता है. लंदन-पेरिस में वयस्कों की फ़िल्में देखने की कोशिश करते बच्चों की उम्र का पता करने के लिए उनसे टिकट खिड़की पर आई-कार्ड माँगा जाना आम बात है. पश्चिमी देशों में भी वयस्कों की पत्रिकाओं को आम ग्राहकों की नज़र से बचा कर रखने के निर्देश हैं, यानि अलमारी के ऊपर वाले हिस्से में. नीचे रखना चाहें तो उस पर काली जिल्द इस तरह लपेटें कि कोई तस्वीर या वयस्क संवाद नहीं, बल्कि सिर्फ़ पत्रिका का नाम-दाम दिखे. पश्चिमी देशों में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन यदि आप धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले या सामाजिक समरसता को तोड़ने वाले बयान देते हैं तो जेल में जाने के लिए तैयार रहना होगा. इसी तरह नितांत व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप को हर सभ्य समाज में बुरा माना जाता है. यहाँ तक कि पश्चिमी देशों के नेता तक सार्वजनिक मंच पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचते हैं.(पश्चिम की बात इसलिए की है, क्योंकि भारत में हर तरह के अतिवाद को जायज़ ठहराने के लिए यूरोप-अमरीका की बात की जाती है.)
"अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता" के बारे में अनुनाद जी ने बहुत अच्छी बात कही:
"अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता" का रोना रोने वाले शब्दजाल फैलाकर बरी हो जाने के फिराक में हैं। मेरे खयाल से स्वतन्त्रता की सबसे व्यापक परिभाषा ये है:
"तुम्हारी स्वतन्त्रता वहीं खत्म हो जाती है, जहाँ मेरी स्वतन्त्रता शुरू होती है।"
सीधे-सीधे कहें तो ये कि हर चीज सीमा में ही अच्छी रहती है।
यदि इस तरह की उचित कार्यवाही समय रहते न की गई तो आज नक्सली आए हैं कल उल्फा, बोडो और काश्मीरी आतंकवादी भी नारद पर आ धमकेंगे, वे भी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की बात करेंगे। समय रहते इस नासूर को फैलने से रोकना जरुरी है नहीं तो आगे जाकर पछताना होगा।
उपसंहार
मुझे एक बात अब भी समझ नहीं आती कि जो लोग समझते हैं कि दुनिया के महानतम लेखक/विचारक वही हैं और उनके सिवा सब मूर्ख हैं, उन्हें नारद की जरुरत क्या है? एक तरफ तो वे इसका फायदा उठाना चाहते हैं दूसरी तरफ इसको गलियाते भी हैं। यदि वे सोचते हैं कि नारद तानाशाह है तो वे इससे अलग क्यों नहीं हो जाते, वे खुद ही तो कहते हैं कि उनको नारद की जरुरत नहीं फिर क्यों जबरदस्ती इससे चिपके पड़े हैं। वे लोग अपनी इस 'शानदार' क्रांतिकारी शैली में लिखें बस नारद से खुद को स्वविवेक से अलग कर लें और अपना कालजयी लेखन जारी रखें। अगर वह सही होंगे, पठनीय होंगे तो लोग उनको खुद ही पढ़ने आते रहेंगे।
जो लोग नारद को गंदगी फैलाने का अड्डा बनाना चाहते हैं उनको मेरी सलाह है कि वे अपना एक अलग ब्लॉग एग्रीगेटर बना लें जिस पर सिर्फ इस तरह के जहर परोसने वाले, सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले, व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले, गाली-गलौच वाले, अश्लील सामग्री वाले एडल्ट ब्लॉग, कथित औघड़ी भाषा वाले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर गंदगी परोसने वाले ब्लॉगों को ही शामिल करें। उनके जैसी अभिव्यक्ति के समर्थक सब लोग वहाँ चले जाएं, सभी वहाँ आपस में जितना मर्जी कुश्ती करें।
आज इस कार्यवाही पर नारद से जुड़ा पूरा समूह राहत महसूस कर रहा है। बहुसंख्य चिट्ठाकार इस फैसले से पूर्ण सहमत हैं बस बात यह है कि वे या तो विवाद से बचने की खातिर या खुद पर कोई लेबल लगाए जाने के भय से इस बारे लिखने से कतरा रहे हैं। मेरा सभी चिट्ठाकारों से फिर से अनुरोध है कि चिट्ठाजगत के सौहार्द को बनाए रखें और नारद के इस कदम के प्रति अपना समर्थन जाहिर करें। यदि आज भी उन्होंने ऐसा न किया तो यह बहुत बड़ा नैतिक अपराध होगा जैसा कि कहा भी गया है, "जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके अपराध"।
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30 टिप्पणियाँ:
मैं उम्मीद करता हूँ श्रीशजी, आपके इस आलेख को पढ़ने के बाद "हो-हल्ला मचाने वाले" अपनी गलती का एहसास करते हुए सृजनात्मक कार्य में अपनी ऊर्जा लगायें।
मेरी शुभकामनाएँ उनके साथ है।
विचारों की अभिव्यक्ति और अंट- संट बकने मे बहुत फ़र्क है . घर मे भी कोई आवशयक नहीं कि सब के सब लोग एक ही भाषा बोलें , विचार अलग हो सकते हैं , बर्तन खडक सकते हैं लेकिन अगर कोई विचार अपनी सीमा और मर्यादा को लाघं रहा हो तो ऐसे मे बाहर का रास्ता दिखाना ही ठीक रहता है. नारद ने जो भी किया वह समय को देखते हुये नितांत आवशयक था .
एक एक शब्द का समर्थन करता हूँ, साथ ही साथियों से अनुरोध करता हूँ, की अगर वे नारद की कार्यवाही का समर्थन करते है तो उसे जाहिर करने में हिचके. आपके समर्थन का एक शब्द भी नारद की सोच को मजबुत करेगा.
बहुत सुन्दर लिखा है.
कमाल की लेखन शैली है,
बिना किसी पर आरोप प्रत्यारोप, सबको सही बात समझा दी आपने। मास्साब यूं ही नहीं कहते हैं लोग आपको।
इतने सही तरीके से समझाने के बाद नारद के फैसले का विरोध करने वालॊं को हकीकत समझ में आ गई होगी और समझ में ना आई हो तो यही कह सकते हैं
" सबको सन्मति दे भगवान"
एक एक शब्द का समर्थन करता हूँ, साथ ही साथियों से अनुरोध करता हूँ, की अगर वे नारद की कार्यवाही का समर्थन करते है तो उसे जाहिर करने में ना हिचके. आपके समर्थन का एक शब्द भी नारद की सोच को मजबुत करेगा.
बहुत सुन्दर लिखा है.
बहुत बढ़िया लिखा है श्रीष भाई
बकवास
कुतर्क
नक्सलबाडी लाल सलाम
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद
हिटलरशाही नहीं चलेगी!
नहीं चलेगी, नहीं चलेगी!
सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
हो गयी है पीड पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
सही शब्दों में आपने अपनी बात रखी है, ज्यादा बोलना नही चाहता, अपने ब्लाग पर काफी लिख चुका हूँ।
http://pramendra.blogspot.com/2007/06/blog-post_16.html
श्रीश जीं
आप अपने पथ पर डटे रहो, कोई तनाव पालने की आवश्यकता नहीं। इतना बड़ा देश है और अपने नारद में इस तरह के मसले आएंगे। उन्हें दृढ़ता से निपटाते रहो। इस लेख के लिए बधाई ।
दीपक भारतदीप
वाह साहब क्या खूब लिखा है, एक-एक शब्द से सहमत, कुछ लोग अपनी कुंठायें और स्वार्थ निकालने में लगे हैं यहाँ पर... कई मित्रों की उनके विरोध में ना लिखने की इच्छा होते हुए भी लिखना पडता है, क्योंकि कोई कब तक संयम बरत सकता है.. यदि वे कुतर्क फ़ैलाने पर उतारू हैं तो उसका जवाब देना भी कुछ मित्रों को बेहतर तरीके से आता है.. फ़िर वही सवाल आ जाता है कि शुरुआत किसने की ? फ़िर भी मुझे लगता है कि आपकी इस विस्तारित पोस्ट पढने के पश्चात दोनों पक्षों को अकल आयेगी... साधुवाद
भाई श्रीश,
आप द्वारा उद्धृत अंश अपने आप में बेजोड़ हैं। आपके तर्क भी बहुत तीक्ष्ण हैं।
किन्तु मैं चाहूँगा कि विषयान्तर हो और हिन्दी चिट्ठाजगत निरन्तर आगे बड़ता रहे। पहले ऐसी ही स्थिति थी, किन्तु कुछ भ्रान्ति-रोगियों के आने के बाद एक ही विषय प्रधान हो गया है - राजनीति। कई बन्धुओं की टिप्पणियाँ देखकर लग रहा है कि वे विक्षिप्तावस्था को प्रप्त हो गये हैं। कुछ तीव्र गति से इसकी ओर अग्रसर हैं। मुझे डर है कि "मुर्दाबाद - मुर्दाबाद" का जाप करते हुए कहीं खुद ही मुर्दा न बन जांय।
नारद किसे रखे और किसे ना रखे यह उसका अधिकार है, इस बात का हम समर्थन करते है!
बहुत ही अच्छे तरीके से सिलसिलेवार आपने अपनी बात कही है। मेहनत कर संदर्भ भी छांटे हैं।
बढ़िया।
प्रिय श्रीश,
ये सब लिखने के लिए आभार- ऊपर अविनाश की टिप्पणी है कि ये बकवास है, मुझे ऐसा नहीं लगता- मुझे इस मुद्दे पर आपसे संवाद की उतनी ही जरूरत लगती है जितनी राहुल, संजय या अविनाश से।
तकनीकी तौर पर आपकी बातें सही हैं- एक तो यह कि आपको हटाए गए ब्लॉग की सामग्री आपत्तिजनक लगी (मुझे भी लगी), दूसरा यह कि नारद को यह अधिकार है कि वह किसे ऐग्रीगेट करेगा किसे नहीं- इन दोनों सहमतियों के बावजूद हम लगातार इस कार्रवाई पर पुनर्विचार का अनुरोध कर रहे हैं नारद से, आपसे, संजय से और सबसे...क्यों
इसलिए नहीं कि हम सभी आतंकवादी, नक्सलवादी, नस्लवादी, नस्ल, गैंग वगैरह हैं वरन ठीक इसके विपरीत कारणों से।
पूरी टिप्पणी बहुत लंबी हो गई थी इसलिए पोस्ट बनानी पड़ी। कृपया मेरे चिट्ठे पर देखें
आपने अपने विचार सफ़ाई से रखे..
चूँकि आप नारद से गहरे तौर पर जुड़े़ हैं.. और नारद के दूसरे प्रतिनिधियों ने इस लेख के किसी भी अंश का प्रतिवाद या असहमति नहीं ज़ाहिर की है..बल्कि कुछ ने पूर्ण सहमति ही जताई है.. तो क्या आप के इन विचारों को नारद का घोषणा पत्र माना जाय..? जैसा कि संजय बेंगाणी ने कहा है कि आपके शब्द नारद की सोच को मजबूत करेंगे.. ?
kya bakwaas hai ye?
kuch aur nahi mila ya fir hit ki ganga me nahane ka shauk aapko bhi charrraya hai ?
aisee bakwaas karni ho to chiththa likhna chor dijiye !!
यार , तुम कही जाकर मंत्र वंतर बाँचो , कहाँ यहा अपना समय ख़राब कर रहे हो बकवास करने मे !!
बहुत अच्छी तरह से अपनी बात कही है। स्वामीजी को लगता है आगे आने वाले समय का आभास था तभी उन्होंने यह लेख लिखा था जिसका जिक्र आपने किया। जिस अंदाज में अविनाश अपनी बात रख रहे हैं उससे पता चलता है कि उनकी तर्क शक्ति कितनी प्रखर है और उसमें कितनी गहराई है!
समर्थन।
श्रीशजी, नक्सलवादियों और देशद्रोहियों की अच्छी खबर ली है आपने। एक-एक शब्द से सहमत हूं। जिन्हें लोकतंत्र में विश्वास नहीं, उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बात करने का कोई अधिकार नहीं है।
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