भाई संजीव तिवारी ने अपने चिट्ठे पर हिन्दी कम्प्यूटिंग के संदर्भ में कुछ सवाल उठाए हैं। वे जानना चाहते हैं कि कम्प्यूटर पर हर कार्य हिन्दी भाषा में क्यों नहीं हो सकता, साथ ही वे जानना चाहते हैं आखिर कब तक हिन्दी में प्रोग्रामिंग भाषा अस्तित्व में आएगी।
इन वालों का जवाब बेहतर तरीके से हरिराम जी दे सकते हैं क्योंकि हिन्दी में प्रोग्रामिंग भाषा का विकास उनका भी स्वप्न है, इन कार्यों संबंधी जटिलताओं के बारे में वे अपने कई लेखों में बता भी चुके हैं। मैथिली जी ने भी कुछ समय पहले इस बारे में सुझाव मांगे थे, अतः इस लेख में मैं हिन्दी कम्प्यूटिंग की दशा-दिशा पर अपना नजरिया तथा कुछ सुझाव पेश कर रहा हूँ। चिट्ठाकारी संबंधी एक्सक्लूसिव सुझावों पर लेख अलग से लिखूँगा।
हिन्दी/इण्डिक कम्प्यूटिंग सही कहें तो अभी आधे रास्ते भी नहीं पहुँची। अभी तो सिर्फ इसमें पढ़ना-टाइप करना सरल हुआ है। उसके लिए भी बंदे को सौ पापड़ बेलने पड़ते हैं। कम्प्यूटर और इंटरनैट पर काम करते हुए हमारा सामना अक्सर फिर ???? से हो जाता है, अयूनिकोडित प्रोग्राम और सेवाएँ अब भी एक समस्या हैं।
हम हिन्दी के चिट्ठाकार मिलाकर कोई 500 आदमी नैट पर हिन्दीजगत में सक्रिय हैं, यह आँकड़ा बहुत निराशाजनक है। एक आदमी कुछ लिखता है, एग्रीगेटरों के सहारे कुछ पाठक आते हैं, दो-चार दिन तक जितना पढ़ लिया किसी ने ठीक है वरना कम ही पढ़ा जाता है। चिट्ठाकार बैठा टिप्पणियों और स्टैटकाऊंटर को ताकता रहता है। अंग्रेजी के एक सामान्य ब्लॉगर को भी इसकी बजाय काफी पाठक मिल जाते हैं।
वर्तमान हालात में इस दिशा में प्रगति संतोषजनक तो है लेकिन अभी भी दिल्ली दूर है, यहाँ मेरा आशय उस दिन से है जब हिन्दी भी नैट पर चीनी-जापानी, रुसी भाषाओँ के समान अपना रुतबा हासिल कर सकेगी।
मैं अब इस विषय में अधिक विस्तार न देकर व्यावहारिक मुद्दों पर आना चाहूँगा।
ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिन्दी-इण्डिक सपोर्ट
सबसे पहली बात तो ये कि इण्डिक सपोर्ट ऑपरेटिंग सिस्टम में इनबिल्ट होना चाहिए। इसके लिए कंट्रोल पैनल में सैटिंग का टंटा खत्म होना चाहिए। विण्डोज विस्टा में ये हो चुका है, इण्डिक सपोर्ट बाई डिफॉल्ट मौजूद है। लिनक्स, मैकिनटोश में इंस्टालेशन के वक्त ही इसका विकल्प मिलता है। अतः इस बारे में निश्चिंत रह सकते हैं कि नए OS इण्डिक सपोर्ट रेडी हैं। अगले कुछ सालों बाद जब ये नए OS प्रचलन में आ जाएँगे तो ये समस्या तो खत्म हो जाएगी।
फिलहाल विण्डोज 2000 तथा XP के लिए इसका हल है हिमांशु सिंह का इण्डिक आईएमई इंस्टालर जो कि बिना विंडोज की सीडी के ही इण्डिक सपोर्ट आसानी से इंस्टाल कर देता है।
विण्डोज में हिन्दी IME इनबिल्ट हो
विण्डोज विस्टा में इण्डिक सपोर्ट तो आ गया लेकिन एक महत्वपूर्ण कमी रह गई - विण्डोज इंस्टाल करने पर हिन्दी लिखने के लिए Hindi IME रेडीमेड मिलना चाहिए, कम से कम इतना हो कि इसे कंट्रोल पैनल में बस एक क्लिक द्वारा सक्षम किया जा सके। अगर ऐसा हो तो कभी न कभी लोगों की इस पर नजर पड़ेगी जरुर और वे जिज्ञासावश हिन्दी का प्रयोग आरंभ कर देंगे।
अभी विण्डोज में सिर्फ इनस्क्रिप्ट IME इनबिल्ट है, फोनेटिक तथा रेमिंगटन नहीं, उसे भी सक्षम करने के लिए बहुत झंझट है। यद्यपि इनस्क्रिप्ट बेहतरीन टाइपिंग प्रणाली है लेकिन नया बंदा इसके लिए मानसिक रुप से तैयार नहीं होता। अभी किसी नए बंदे को हिन्दी टाइपिंग के लिए Baraha, Indic IME आदि टूल डाउनलोड करने पढ़ते हैं, अगर ये इनबिल्ट होते तो बहुत लोग हिन्दी का प्रयोग करते। माइक्रोसॉफ्ट को अपने Indic IME जिसमें कि सभी तरह के कीबोर्ड शामिल हैं और केवल एकाध MB साइज का है, विंडोज में शामिल करना चाहिए ताकि किसी को भी हिन्दी टाइप के लिए अलग से टूल्स को डाउनलोड न करना पड़े।
हिमांशु भाई और मेरा दृढ़ विश्वास है कि यह हिन्दी कम्प्यूटिंग की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा, इस विषय पर अलग से एक पोस्ट लिखूँगा।
पुराने ऑपरेटिंग सिस्टमों में यूनिकोड समर्थन
विण्डोज 98 तथा ME आदि पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम अब भी भारत में जडें जमाए बैठे हैं, खासकर साइबर कैफे में इनकी पैनीट्रेशन बहुत है जिसका उपयोग भारत का मध्यवर्ग आज भी इंटरनैट एक्सैस के लिए मुख्य रुप से करता है। इन OS में यूनिकोड का समर्थन सीमित है। विभिन्न औजारों की मदद से काट-चिपका कर इंटरनैट पर हिन्दी में काम तो किया जा सकता है पर मजा नहीं आता। ये भी हिन्दी के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा है क्योंकि इन OS के लिए प्रचलित IME जैसे Baraha, Indic IME आदि जैसे कीबोर्ड ड्राइवर नहीं बनाए जा सकते। पिछले दिनों हरिराम जी के साथ हुई चर्चा में मैंने निष्कर्ष निकाला कि फिलहाल इनका उपाय ब्राउजरों के लिए IME प्लगइन ही हैं।
इस काम के लिए आजकल हिमांशु भाई को पटा रहा हूँ कि वे हिन्दी-तूलिका टूल को ब्राउजर प्लगइन का रुप दें ताकि सभी OS में सीधे हिन्दी टाइप की जा सके।
अच्छी बात ये है कि जो नए कम्प्यूटर लिए जा रहे हैं वे नए OS युक्त हैं, अतः धीरे-धीरे पुराने OS प्रचलन से बाहर होने पर ये समस्या भी सुलझ जाएगी।
अयूनिकोडित प्रोग्रामों में हिन्दी टाइपिंग
अभी भी बहुत से प्रोग्रामों में यूनिकोड हिन्दी का समर्थन नहीं है, खासकर ग्राफिक्स और डीटीपी अनुप्रयोंगों में, इनमें केवल 8 बिट ट्रू टाइप फॉन्टों जैसे कि कृतिदेव आदि के द्वारा केवल रेमिंगटन टाइपिंग के जानकार ही टाइप पर सकते हैं। वैसे तो यह काफी गम्भीर मामला है लेकिन तात्कालिक समस्या ये है कि फोनेटिक तथा इनस्क्रिप्ट के प्रयोगकर्ता इन प्रोग्रामों में हिन्दी में काम नहीं कर पाते।
इसका तात्कालिक उपाय है कि इन प्रोग्रामों के लिए नॉन-यूनिकोड IME/कीबोर्ड ड्राइवर बनाए जाएँ। इसके लिए कैफेहिन्दी वाले मैथिली जी को पटा रहा हूँ, हाल ही में उनके सर्वर में आई खराबी के चलते वे व्यस्त हैं जिस कारण इस दिशा में प्रगति नहीं हो पा रही।
गूगल सर्च तथा जीमेल में हिन्दी टाइपिंग टूल
गूगल सर्च इंटरनैट पर किसी भी सामग्री को खोजने हेतु सबसे अधिक प्रयोग किया जाता है। यह साइटों एवं ब्लॉगों पर ट्रैफिक का एक प्रमुख स्रोत है। लेकिन आम इंटरनैट प्रयोक्ता को हिन्दी में टाइप करने का तरीका पता होता नहीं जिस कारण वह हिन्दी में खोज नहीं सकता। यदि गूगल अपना इण्डिक ट्रांसलिट्रेशन टूल गूगल भारत पेज पर लगा दे तो इससे नए लोग भी हिन्दी ब्लॉगों तथा हिन्दी साइटों पर पहुँचेंगे और हिन्दी जगत से परिचित होंगे।
इस बारे मैंने कुछ समय पहले एक विचार अप्रैल फूल के रुप में प्रस्तुत किया था।
अक्सर बहुत से हिन्दी ब्लॉगरों की कहानी यही होती है कि तुक्के से (Accidentally) किसी हिन्दी ब्लॉग पर पहुँचे। पहले तो उसे भयंकर हैरानी होती है कि हिन्दी में भी ब्लॉग या साइटें होती हैं फिर वह एक ब्लॉग से दूसरे ब्लॉग पढ़ता जाता है। कुछ दिन बाद उसे खुद भी ब्लॉगियाने की खुजली होने लगती है और जहाँ चार पोस्टें लिखी फिर ये बीमारी उसे छोड़ती नहीं।
ये तो सभी जानते हैं कि इंग्लिश ब्लॉगों पर आने वाले ट्रैफिक का बहुत सा हिस्सा गूगल सर्च से आता है। अब दिक्कत ये है कि आम जनता को ये मालूम ही नहीं है कि हिन्दी में भी टाइप होती है जिससे कि वह गूगल में खोज सके। दूसरी बात कि अगर वो कभी सुनता भी है तो तो सोचता है कि हिन्दी टाइप तो सीखनी वगैरा पड़ती होगी इसलिए अपने बस की नहीं। लेकिन इस टूल के आने से वो खुद टाइप करके सर्च कर सकेगा और नतीजतन हिन्दी जगत से परिचित होगा।
दूसरी बात है जीमेल में उपरोक्त हिन्दी टूल लगाना, इससे जनता को जो हिन्दी टाइपिंग और ब्लॉगिंग से अनभिज्ञ है पता चलेगा कि हिन्दी में भी मेल भेजी जा सकती है। यह भी हिन्दी के प्रसार में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
गूगलबाबा के लिए ये काम मुश्किल नहीं सब सामान उसके पास तैयार पड़ा है। हाल ही में गूगल बाबा द्वारा शुरु की गई इण्डिया लैब से इस बारे में आस बंधी है, एक ऑनस्क्रीन टाइपिंग गैजेट iGoogle पेज के लिए उपलब्ध करवाया भी गया है।
हिन्दी टंकण के लिए उपयुक्त पद्धति का विकास
एक नए प्रयोक्ता की आज भी पहली समस्या हिन्दी टाइप करना ही है। हिन्दी टंकण के लिए वैसे तो ढेरों विधियाँ हैं, लेकिन प्रचलित केवल तीन ही हैं - फोनेटिक, इनस्क्रिप्ट एवं रेमिंगटन। इनमें से रेमिंगटन तो अब आउटडेटिड हो चुकी है तथा केवल पुराने टाइपिस्टों द्वारा ही प्रयोग की जा रही है। बैकवर्ड कंपैटिबिलटी के लिए इसे यूनिकोड औजारों में अक्सर शामिल कर लिया जाता है। असल मुकाबला फोनेटिक और इनस्क्रिप्ट के बीच है। मैंने दोनों को लंबे समय तक प्रयोग किया है और पाया कि टच टाइपिंग के लिहाज से इनस्क्रिप्ट बेहतर है लेकिन फोनेटिक सरलता के मामले में बाजी मार ले जाती है। चूंकि इसके लिए कोई लर्निंग कर्व नहीं है इसलिए नए लोग इसे आसानी से अपना लेते हैं जबकि इनस्क्रिप्ट के लिए वो मानसिक रुप से तैयार नहीं होते। ये बात अलग है कि बाद में धीरे-धीरे फोनेटिक की कमियाँ उनके सामने आने लगती हैं। सत्य बात यह है कि अगर कोई इनस्क्रिप्ट सीखने के लिए मानसिक रुप से तैयार हो जाए तो यह बहुत आसान है, बस थोडे़ उचित मार्गदर्शन की जरुरत है।
अब कई इनस्क्रिप्ट प्रेमी जैसे बालेन्दु जी, सृजनशिल्पी जी आदि फोनेटिक को परे करके केवल इनस्क्रिप्ट को चलाए जाने के पक्षधर हैं पर मैं उनसे सहमत नहीं। फोनेटिक नए लोगों को आकर्षित करती है, उन्हें हिन्दी से जोड़ती है। एक बार बंदा हिन्दी में लिखना शुरु कर दे, बाद में वो चाहेगा तो इनस्क्रिप्ट अपना लेगा। मैंने यही किया फोनेटिक से शुरुआत करके इनस्क्रिप्ट पर आया, यदि शुरु में ही मुझे इनस्क्रिप्ट थमा दिया जाता तो शायद मैं आज हिन्दी में न लिखता होता।
मेरा विचार है कि फोनेटिक (ट्रांसलिट्रेशन) का मानकीकरण किया जाना चाहिए तथा सभी औजारों में मानकीकृत स्कीम ही प्रयुक्त हो। यद्यपि इस तरह की एक परियोजना भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही है परंतु वह ट्रांसलिट्रेशन केवल लिपि बदलने के लिए ही सही है, टाइपिंग के लिए नहीं।
इनस्क्रिप्ट एक बेहतरीन प्रणाली है लेकिन इसमें भी कुछ कमियाँ हैं, इसे संशोधित किया जाना चाहिए, फिलहाल मानक बनाए जाने योग्य एकमात्र पद्धति यही है।
वैसे कभी-कभी मुझे लगता है कि फोनेटिक और इनस्क्रिप्ट प्रणालियों की विशेषताओं का अध्ययन कर एक बेहतर प्रणाली बनाई जा सकती है। हरिराम जी कुछ इसी तरह के प्रयास में जुटे हैं, वे WX आधारित ट्रांसलिट्रेशन स्कीम पर काम कर रहे हैं।
वैसे उनका विचार है कि भारतीय भाषाओं के ध्वन्यात्मक गुण के कारण इनमें टाइपिंग के लिए स्पीच टू टैक्स्ट प्रणाली अधिक कारगर है। हाल ही में सी-डैक, आईबीएम और भारत सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा संयुक्त रुप से विकसित श्रुतलेखन नामक हिन्दी स्पीच रिकॉग्नीशन सॉफ्टवेयर जारी किया गया है। इसकी कीमत लगभग 5000 रुपए है, यदि यह कारगर हुआ तो यह कीमत कुछ ज्यादा नहीं। अभी तो पता नहीं कि यह कितना कारगर है, सृजनशिल्पी जी इस बारे कृपया जानकारी दें।
सॉफ्टवेयरों का हिन्दीकरण
यह संतोषजनक बात है कि यह कार्य हमारे वश का है। हिन्दी चिट्ठाजगत में बहुत से तकनीकी अनुवादक जैसे आलोक कुमार, रविरतलामी, पंकज नरुला, देबाशीष चक्रबर्ती, जीतेंद्र चौधरी आदि शामिल हैं। हिन्दीकरण के लिए अक्षरग्राम पर निपुण नामक प्रोजैक्ट आरंभ किया गया है जिस पर सभी अनुवादक सामूहिक रुप से योगदान दे सकें।
हिन्दी कम्प्यूटिंग तंत्रों के विकास के लिए एक साझा मंच
यह बात मेरे दिमाग में काफी पहले से है कि हिन्दीजगत के प्रोग्रामर, डैवलपर तथा अन्य टैक्नोक्रैट एक साझा मंच पर हिन्दी कम्प्यूटिंग संबंधी तंत्रो का विकास करें। अभी जिन तंत्रों का उपयोग करते हैं उनमें से अधिकतर बाहरी लोगों द्वारा बनाए गए हैं जिन तक कि हम अपनी राय नहीं पहुँचा सकते। तो बजाय कि उनकी दया पर निर्भर रहने के सभी एक-दूसरे के ज्ञान और अनुभव का लाभ उठाएँ और सामूहिक रुप से हिन्दी संबंधी टूल्स का विकास हो।
कुछ ऐसा ही विचार हिमांशु ने भी जाहिर किया, उन्होने ने इसके लिए सोर्सफोर्ज.नैट जैसा एक मंच बनाने का सुझाव दिया।
इसके अतिरिक्त मेरा हरिराम जी, सृजनशिल्पी जी तथा रविरतलामी जी आदि से अनुरोध है कि अपने इण्डिक कम्प्यूटिंग विशेषज्ञ परिचितों को हिन्दी चिट्ठाजगत में लाएँ, क्योंकि इससे जुड़कर ही कोई हिन्दी कम्प्यूटिंग की समस्याओं और आवश्यकताओं को समझ सकता है।
देवनागरी यूनिकोड मानकीकरण संबंधी कोर स्तर की समस्याएँ
देवनागरी तथा अन्य भाषाओं का यूनिकोड मानकीकरण सही तरीके से नहीं हुआ जिससे कि इनमें कम्प्यूटिंग एक जटिल प्रक्रिया बन गया। इस विषय में हरिराम जी ने इस लेख में जानकारी दी है तथा इसके हल हेतु कुछ सुझाव भी बताए हैं। वे इस मामले पर सरकारी संस्थानों का ध्यान आकर्षित करते रहते हैं। इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए तथा कोई सर्वमान्य हल तलाश किया जाना चाहिए।
कम्प्यूटर पाठ्यक्रमों में हिन्दी/इण्डिक कम्प्यूटिंग
खेद है कि सूचना प्रोद्यौगिकी में अग्रणी भारत भर में किसी भी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम में इण्डिक कम्प्यूटिंग विषय शामिल नहीं है (कुछ अतिविशिष्ट कोर्सों को छोड़कर). हालत यह है कि अच्छे-अच्छे आईटी प्रोफैशनलों को यूनिकोड क्या बला है मालूम तक नहीं। ऐसे लोग भारतीय भाषाओं के लिए क्या योगदान दे पाएँगे।
हर विश्वविद्यालयी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम में इण्डिक कम्प्यूटिंग विषय शामिल होना चाहिए जिसमें यूनिकोड, इनस्क्रिप्ट तथा अन्य टाइपिंग प्रणालियाँ, देवनागरी लिपि का परिचय, हिन्दी कम्प्यूटिंग के मौजूदा साधन तथा बहुभाषी सॉफ्टवेयरों (Multilingual Softwares) का विकास, प्राकृतिक भाषा संसाधन (Natural Language Processing) आदि जानकारी शामिल हो।
यूनिकोड हिन्दी के बारे में जागरुकता फैलाना
यह एक ऐसा कार्य है जिसे हर चिट्ठाकार कर सकता है। बहुसँख्य कम्प्यूटर और इंटरनैट प्रयोक्ता यूनिकोड हिन्दी और ऑनलाइन हिन्दीजगत से अनजान हैं। इसके लिए कई तरीके हैं:
- सर्वज्ञ विकी को समृद्ध बनाकर, अपने चिट्ठे पर इस बारे में लिखकर
- परिचर्चा, चिट्ठाकार समूह आदि हिन्दी मंचों पर साथियों की सहायता करके
- इंटरनैट पर अधिकतम हिन्दी का प्रयोग करके खासकर हिन्दीजगत से बाहर के मित्रों-परिचितों के साथ चैट, ईमेल, ऑर्कुट आदि तमाम साधनों पर हिन्दी का प्रयोग कर
- अपने कम्प्यूटर, इंटरनैट प्रयोग करने वाले मित्रों को हिन्दी टाइपिंग, हिन्दी ब्लॉगिंग आदि से जोड़कर
इस बारे में अनुनाद जी ने कुछ बहुत अच्छे सुझाव दिए थे, अवश्य देखें।
मैंने अपने अनुभव से पाया है कि बजाय आप किसी को ये समझाने में समय व्यर्थ करने के कि हिन्दी में काम करना सरल है उसके पीसी पर हिन्दी चलाकर दिखा दीजिए और खुद उससे टाइप करवाइए, उसकी झिझक और संदेह जाता रहेगा। मैंने इस फॉर्मूले का उपयोग कई बार किया है, इस बारे अलग से एक लेख लिखूँगा।
उपरोक्त में से अधिकतर विषयों पर अलग से लेख लिखूँगा, (यानि और पकाऊंगा, सस्ते में नहीं छोड़ने वाला) 
कृपया सभी पाठक उपरोक्त मुद्दों पर अपनी राय अवश्य दें।

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